ग़म का बवंडर
है एक बवंडर, मेरे घर के बाहर, जो अक्सर मेरी मज़बूत दीवारों को झंझोड़ कर रख देता है। होता है कभी-कभी मेरा घर किलकारियों से प्रज्वलित, कुछ अस्थायी भाव आते हैं, जाते हैं, रहते हैं मेरे इर्द-गिर्द, पर फिर न जाने कब एकाएक उस बवंडर
है एक बवंडर, मेरे घर के बाहर, जो अक्सर मेरी मज़बूत दीवारों को झंझोड़ कर रख देता है। होता है कभी-कभी मेरा घर किलकारियों से प्रज्वलित, कुछ अस्थायी भाव आते हैं, जाते हैं, रहते हैं मेरे इर्द-गिर्द, पर फिर न जाने कब एकाएक उस बवंडर
तुम आते इस सर्द में तो तुम्हें मख़मली रजाई बन अपने भीतर समा लेता। जब तुम आँख मूँदकर सोते, तो तुम्हारे बालों में अपनी उँगलियों की कंघी से बेबात तुम्हें सँवारता। वह बिन तेल मालिश, जो तुम्हारे सिर के पीछे बेवजह कभी शुरू, कभी ख़त्म
जब तुमने छीन ली मेरी साँसें, तुमने न केवल मेरा सुकून छीना, तुमने छीने मेरे सारे सपने, जो मैं न जाने कब से पिरो रहा था। तेरे संग से भी ज़्यादा ज़रूरी था शायद उन ख्वाबों का पूरा होना, मेरे चलने का सहारा होना, तेरे
सर्दी आई धीमे से बिन दस्तक तुम्हारी खिड़कियों दरवाज़ों की बेजोड़ नाकाबंदी पर बेलगाम बेहिचक आक्रमण कर दहलीज़ों की छिद्रों से घुसपैठ कर बिन आहट बिस्तर पर चढ़ अपनी तलवार गर्दन पर रख तुमसे सवाल कर बैठी की जीना है तो मेरे इशारों पर जीना
बादल, चंदा, तारे एक तरफ, पर सूर्य हमारा अतुलनीय। हमारे आसमान का पहरेदार,एक लौता ब्रह्मांडीय जीव, हमारे किरमिच की शान,अकेले ही बढ़ाता, जिसके चारों ओर हमचक्कर लगाते। और क्यों न लगाएँ? चीज़ ही है ऐसी! हमारे अवकाश का तर्क,हमारे अस्तित्व का कारण, दिन भर साथ
रातों की नींद गायब है,अनहोनी की बिल्लाहट से,कोई तो छिपा है झाड़ियों में जो कर रहा इंतज़ार,मेरी तरह, मेरे सो जाने का। अंधेरे की दस्तक है,याद नहीं कि,दरवाज़ा बंद किया था या नहीं,फटी चादर ओढ़े,निराश्रय निहारता प्रकाश के ख़ाली झोले को, सोच में डूबाकौन है
दिन की इच्छा रखने वाले,अंधकार में रहना सीख,काल जीव के शैली में रात भी ज़रूरी है। प्रकाश की चाहत भी तोउठी थी अंधियारे से,विष के प्रभाव से हीअमृत पनपता है। पाने की इच्छा है तोकुछ खोना भी ज़रूरी है,दुर्गंध की अवगुण से ही पुष्प का
ए समोसे!उधर अकेले क्यों खड़ा है?आज फिर से आलू खा कर तेरा पेट बड़ा है।जरा इधर भी तो आ,वह आलू हमें भी तो चखा!पापी तो बस पेट है, हमने थोड़ी ही कोई पाप किया है,पापी तो तू है, जो सामने आ कर भी अपनी ज़िद
“रुमाली रोटी! आज फिर तेरी याद आयी रे!” मन अचरज में पड़ाकी इतनी पतली हो कर भी तू कैसे भर देती पेट मेरा?रूमाल की हरकतें देख कर है तेरा नाम पड़ा, कई बार तो मैं धोखा खा कर जेब में तुझे ले चल पड़ा। न
घर न जा परिंदे वहाँ ताला है बदला, तेरी चाबी से अब न खुलेगा,वापस कहाँ जाएगा?इतने दिनों तू था एक अजनबी, अब तुझे क्यों कोई गले लगाएगा?जिस युद्ध में था तू डूबा,वहाँ जाने से तुझे था रोका ,तू फिर भी लड़ने था दौड़ाकी तेरा रक्त