ग़म का बवंडर

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है एक बवंडर,
मेरे घर के बाहर,
जो अक्सर मेरी मज़बूत दीवारों को
झंझोड़ कर रख देता है।

होता है कभी-कभी मेरा घर
किलकारियों से प्रज्वलित,
कुछ अस्थायी भाव
आते हैं,
जाते हैं,
रहते हैं मेरे इर्द-गिर्द,
पर फिर न जाने कब एकाएक
उस बवंडर में समा जाते।

जी करता है कभी-कभी निकलने को,
वो दूर अटल पहाड़ों में जाकर थमने को,
कभी समंदर से गीत सुनने को,
वो गाँव के लहलहाते खेतों की शांति
के बीच रहकर उनसे कुछ बातचीत करने को।

समय की दौड़ की प्रतियोगिता में
भाग लेने को,
पर बाहर उस विराट चक्रवात को देखकर
सहम जाती हूँ,
अश्रुओं से संवाद कर आती हूँ।

अधूरे सपने लिए बैठी,
मैं किसी ज़िंदा मुर्दे की तरह,
खिड़कियों के परदों से उसे ताकती,
सोचती हूँ कि क्या यह झंझावात कभी शांत होगा?
मुस्काती छोटी खुशियाँ ढूँढ,
पर वो अंत में और छोटी हो जाती।

वो पुरानी तस्वीरें दौड़ती मुझे झिंझोड़ने,
अगर उन पर नज़र पड़ भी जाए तो,
इस अंधड़ से मचा
घनघोर अँधेरा,
मुझे आँख मूँदे रहने पर मजबूर करता।

क्यों ढूँढूँ मैं प्रकाश?
जब नेत्रहीन रहने में बाहर जैसा सुकून है?
एक अजीब-सी शांति है इस तूफ़ान में
जो मुझे बिस्तर से उठने नहीं देती,
पर कभी कभी मुझे बिस्तर से उठकर
इस शांति में गुम भी हो जाने देती।

अब यह चक्रवात
यहीं बाहर ही मंडराता रहता,
और मैं अपने घर की चार दीवारी में
बस यूँ ही क़ैद रहती।

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